सिद्धार्थनगर का ‘खूनी’ अस्पताल: नवजात की मौत के बाद भी प्रशासन की मेहरबानी, नहीं हुई गिरफ्तारी।
कागजों पर FIR, जमीन पर ‘मौत का व्यापार’: इटवा में स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती से मासूमों की जान दांव पर। इटवा में ‘मौत का हॉस्पिटल’: सबूत मिटाने की कोशिश, प्रशासन अब भी ‘नोटिस’ की रस्म अदायगी में उलझा।
‘मौत का व्यापार’: सिद्धार्थनगर में नवजात की बलि लेने के बाद भी बेखौफ चल रहा है ‘जनता सेवा हॉस्पिटल’, प्रशासनिक सुस्ती पर उठे सवाल
विशेष संवाददाता | बस्ती मंडल
सिद्धार्थनगर/इटवा। 31 मई, 2026
- ऑपरेशन के बाद नवजात की मौत: इटवा के जनता सेवा हॉस्पिटल की धांधली का भंडाफोड़, सबूत मिटाने के लिए रिनोवेशन का ढोंग।
- सिद्धार्थनगर: बिना सर्जन और एनेस्थीसिया के चल रहा था प्रसव केंद्र? एक और जान गई, विभाग खामोश।
- जांच टीम के पहुंचने से पहले गायब हुए ओटी के उपकरण: क्या ‘सेटिंग’ के दम पर चल रहा है जनता सेवा हॉस्पिटल?
सिद्धार्थनगर के इटवा कस्बे में संचालित ‘जनता सेवा हॉस्पिटल’ (न्यू सेवा हॉस्पिटल) इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है, लेकिन वजह चिकित्सा सेवा नहीं, बल्कि एक मासूम की मौत और उसके बाद प्रशासन की वह रहस्यमयी चुप्पी है, जिसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 23 मई 2026 को हुई नवजात की मौत के बाद अस्पताल पर एफआईआर तो दर्ज हुई, लेकिन ‘खूनी अस्पताल’ आज भी सील होने के बजाय कानून की आंखों में धूल झोंक रहा है।
क्या हुआ था उस खूनी रात? (घटनाक्रम)
डुमरियागंज तहसील के सहदेइया गांव निवासी चंद्रमणि अपनी गर्भवती पत्नी वंदना को प्रसव पीड़ा के बाद 23 मई की रात लगभग 11:00 बजे इटवा स्थित इस अस्पताल में लेकर पहुंचे थे। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने बड़ी-बड़ी बातें करते हुए भरोसा दिलाया कि उनके यहां अनुभवी डॉक्टरों की टीम मौजूद है।
लेकिन, रात के अंधेरे में वहां जो हुआ, वह चिकित्सा के नाम पर कलंक है। अस्पताल में न तो कोई स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynecologist) थी, न सर्जन और न ही एनेस्थीसिया देने वाला कोई डॉक्टर। अस्पताल के अनाड़ी कर्मचारियों ने ही खुद को ‘डॉक्टर’ बताते हुए ऑपरेशन कर दिया। इस घोर लापरवाही ने एक नवजात शिशु की जान ले ली, जबकि प्रसूता वंदना आज भी मौत और जिंदगी के बीच संघर्ष कर रही है।
पुलिस की एफआईआर और कागजी घोड़े
पीड़ित पिता की तहरीर पर पुलिस ने संगीन धाराओं में मामला दर्ज तो किया है:
- धारा 106(1): लापरवाही से मौत।
- धारा 125: दूसरों के जीवन या सुरक्षा को खतरे में डालना।
- धारा 318(4): धोखाधड़ी (छल करना)।
- धारा 61(2): आपराधिक साजिश।
मुकदमा संख्या 107/2026 दर्ज होने के आठ दिन बाद भी किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी न होना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। क्या गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज होने के बाद भी आरोपी पुलिस की पकड़ से दूर हैं? या फिर उन्हें किसी रसूखदार का संरक्षण प्राप्त है?
जांच टीम को गुमराह करने का दुस्साहस
शुक्रवार को जब सीएमओ डॉ. रजत कुमार चौरसिया के निर्देश पर एसीएमओ डॉ. आरजी सिंह, डिप्टी सीएमओ डॉ. आशीष कुमार अग्रहरि और इटवा सीएचसी अधीक्षक डॉ. संदीप कुमार द्विवेदी की संयुक्त टीम जांच करने पहुंची, तो वहां का मंजर किसी फिल्मी साजिश से कम नहीं था।
अस्पताल प्रबंधन ने जांच टीम के पहुंचने से पहले ही पूरे अस्पताल को ‘साफ’ कर दिया था। ऑपरेशन थिएटर से उपकरण गायब थे, दवाएं हटा दी गई थीं और आनन-फानन में अस्पताल के अंदर मरम्मत का काम शुरू कर दिया गया था। जांच टीम को यह दलील दी गई कि “अस्पताल अभी चालू ही नहीं है, यहां तो सिर्फ रिनोवेशन चल रहा है।” स्वास्थ्य विभाग की टीम ने इस भद्दे मजाक को समझ लिया और अस्पताल को जांच पूरी होने तक बंद रखने का नोटिस थमा दिया।
पंजीकरण (Registration) और सवालों का अंबार
अस्पताल के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में REG. NO. RMEE2343411 लिखकर मरीजों को लुभाया जाता है। सवाल यह है कि:
- बिना विशेषज्ञ डॉक्टरों के इस अस्पताल को किस आधार पर मानकों की मंजूरी मिली?
- एक नवजात की मौत के बाद भी अस्पताल को तत्काल सील क्यों नहीं किया गया?
- बार-बार ऐसे अस्पतालों में हादसे होने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग की सर्विलांस टीम क्या सो रही है?
जनता का आक्रोश और व्यवस्था की लाचारी
इटवा के स्थानीय लोगों में इस अस्पताल को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब यहाँ कोई कांड हुआ है, पहले भी ऐसी शिकायतें दबी हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ और बुलडोजर नीति के दावों के बीच, इटवा का यह अस्पताल सरकार की साख पर बट्टा लगा रहा है।
यदि जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई और इस ‘मौत के व्यापार’ को संरक्षण मिलता रहा, तो यह न केवल प्रशासन की विफलता होगी, बल्कि भविष्य में होने वाली किसी और बड़ी त्रासदी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार भी होगी।
क्या प्रशासन की यह ‘नोटिस वाली कार्रवाई’ न्याय के लिए काफी है? या अस्पताल संचालक को बचाने का एक और जरिया है?

















